
युग युगान्तर से सबके आदर्श भगवान परशुराम

देवेन्द्र तिवारी की विशेष खबर
हर युग में मनुष्य के लिए आत्मरक्षण और समाज-सुख- संरक्षण के लिए शस्त्र की आराधन भी आवश्यक है। परन्तु शर्त यह है कि उसकी शस्त्र-सिद्धि पर शास्त्र-ज्ञान का दृढ़ अनुशासन हो। भगवान परशुराम इसी शस्त्र-शास्त्र की समन्वित शक्ति के प्रतीक हैं। सहस्रार्जुन के बाहुबल पर उनकी जीत शस्त्र सिद्धि को प्रमाणित करती है वंही राजभोग से दूरी उनकी समुन्नत शास्त्र का सबल प्रमाण है ऐसे समन्वय व्यक्तिव से ही लोक-रंजन और लोक -रक्षण सम्भव है
भगवान परशुराम शिव संस्कृति, समानता ,वर्ण-हीन व्यवस्था के व्यवस्थापक हैं

भगवान परशुराम शैव-संस्कृति के उपासक हैं। शैव-संस्कृति समानता की वर्ण-हीन सामाजिक व्यवस्था की व्यवस्थापक रही है। उसके सूत्रधार भगवान शिव स्वयं वैराग्य की विभूति से विभूषित हैं। उनके व्यक्तित्व और आचरण में ऐश्वर्य भोग की गंध तक नहीं है। प्रायः शक्ति भोगोन्मुखी होती है। शक्ति की उपलब्धि व्यक्ति को विलासी बना देती है और विलास-वृत्ति से वह परपीड़न को बढ़ावा देती है। शिव की शक्ति विलासोन्मुखी न होकर त्यागोन्मुखी है, अतः सदा सकारात्मक है और इसीलिए वंदनीय भी है। शैव परंपरा में शिव के उपासक वर्ण व्यवस्था से परे है भगवान शिव भूत प्रेत सुर असुर नाग गंधर्व दानव साधु अघोरी संत सब के पूज्य हैं और उनकी उपासना भी क्रिया और विधि रहित है ऐसे शिव के उपासक को आज कुछ स्वार्थी नेता वर्ण व्यवस्था से जोड़कर अपनी भाग विलासिता वाली राजनीति का आधार बनाना चाहते है एक वर्ग उन्हें विरोध और शोषक की दृष्टि से देखता है तो दूसरा वर्ग अपने समाज का महापुरुष बता कर उनके चरित्र को संकीर्ण करने का प्रयास करता है दोनों ही वर्ग उनकी त्यागोन्मुखी शक्ति और चरित्र को समझने में असमर्थ है भगवान परशुराम केवल त्यगोन्मुखी शक्ति के प्रेरणा स्त्रोत है उनका चरित्र आज किसी वर्ग विशेष का नही अपितु इस संसार के उद्धार का मार्ग है जिसे हर वर्ण के लोगों को समझना चाहिये और जो परशुराम का ना जानने का दम्भ भर का राजनीति कर रहे है उन्हें समय निकाल कर भगवान परशुराम के विषय में पढ़ना चाहिये ताकि उनके भीतर भी शक्ति और शास्त्र (अनुशासन) का समन्वय आ सके।
आज के समय में भगवान परशुराम की प्रासंगिकता

वर्तमान में जिस तरह सत्ता और शक्ति से जुड़ा वर्ग भोग विलासता में सुख की खोज में जुटा है वह स्वम् और समाज दोनों के लिए भष्मासुर बना हुआ है अपनी राजनैतिक शक्ति की चाह में अंधा हो चुका यह वर्ग निचले से निचले स्तर पर जा कर स्वार्थपूर्ति हेतु देश व समाज का भारी नुकसान कर रहा है अतः आज के समय में भगवान परशुराम का चरित्र और आदर्श अनुकरणीय हो जाता है जो यह सिखाता है कि शक्तिधर को शिवत्व की तरह त्यागपूर्ण आचरण करना चाहिये और भगवान परशुराम की तरह लोकरक्षा का व्रत लेकर तप और त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिये

शक्तिधर परशुराम का चरित्र जहां शक्ति के केन्द्र सत्ताधीशों को त्यागपूर्ण आचरण की शिक्षा देता है, वहां वह शोषित पीड़ित क्षुब्ध जनमानस को भी उसकी शक्ति और सामर्थ्य का अहसास दिलाता है। शासकीय दमन के विरूद्ध वह क्रांति का शंखनाद है। वह हर वर्ग के लिए अपने न्यायोचित अधिकार प्राप्त करने की प्रेरणा है। वह राजशक्ति पर लोकशक्ति का विजयघोष है आज भारत में स्वतंत्रता के बाद जब देश में भ्रष्टाचार आतंकबाद और समाजिक न्याय के नाम पर अन्याय पूर्ण आचरण करने वाले देश का नेतृत्व करने वाले सहस्त्रबाहु बने हुए है तो ऐसे असुरों के नाश के लिए भगवान परशुराम की भांति ही शस्त्र और शास्त्र की समन्वित विचारधारा की आवश्कता है
जाति ,धर्म, भू-सीमाओं से ऊपर सबके परशुराम

महापुरूष किसी एक देश, एक युग, एक जाति या एक धर्म के नहीं होते। वे तो सम्पूर्ण मानवता की, समस्त विश्व की, समूचे राष्ट्र की विभूति होते हैं। उन्हें किसी भी सीमा में बांधना ठीक नहीं है। दुर्भाग्य से हमारे स्वातंत्र्योत्तर युग में महापुरूषों को स्थान, धर्म और जाति की बेड़ियों में जकड़ा गया है। विशेष महापुरूष विशेष वर्ग के द्वारा ही सत्कृत हो रहे हैं। एक समाज विशेष ही विशिष्ट व्यक्तित्व की जयंती मनाता है, अन्य जन उसमें रूचि नहीं दर्शाते, ऐसा प्रायः देखा जा रहा है। यह स्थिति दुभाग्यपूर्ण है। महापुरूष चाहे किसी भी देश, जाति, वर्ग, धर्म आदि से संबंधित हो, वह सबके लिए समान रूप से पूज्य है, अनुकरणीय है। इस संदर्भ में भगवान परशुराम जो उपर्युक्त बिडंबनापूर्ण स्थिति के चलते केवल ब्राह्मण वर्ग तक सीमित हो गए हैं, समस्त शोषित वर्ग के लिए प्रेरणा स्रोत क्रांतिदूत के रूप में स्वीकार किए जाने योग्य हैं और सभी शक्तिधरों के लिए संयम के अनुकरणीय आदर्श हैं।