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सत्ता की चाबी इन 6 रणक्षेत्रों में: जानें बंगाल चुनाव 2026 में किसका पलड़ा है भारी?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 का बिगुल बज चुका है। राज्य की 294 सीटों के लिए 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होना है, और 4 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे। इस बार भी मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच है। राज्य के करीब 7.3 करोड़ मतदाता, जिनमें 1.31 करोड़ युवा वोटर शामिल हैं, बंगाल का भविष्य तय करेंगे। इस चुनाव में कल्याणकारी योजनाएं, पहचान की राजनीति, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दे रहने वाले हैं।

आइए नज़र डालते हैं बंगाल के उन प्रमुख चुनावी रणक्षेत्रों पर, जो इस बात का फैसला करेंगे कि राज्य में ममता बनर्जी का किला बचेगा या फिर पहली बार कमल खिलेगा:

1. जंगलमहल: भाजपा के लिए सत्ता का ‘लॉन्चपैड’ (पहला चरण) पुरुलिया, बांकुड़ा, झाड़ग्राम और पश्चिम मेदिनीपुर जैसे आदिवासी बहुल जिले भाजपा के लिए ‘बंगाल का प्रवेश द्वार’ माने जाते हैं। यहां भाजपा अपनी हिंदुत्व और आदिवासी पहचान की राजनीति के बलबूते अपनी बढ़त बनाए रखना चाहती है। दूसरी तरफ, टीएमसी अपनी ‘दुआरे सरकार’ जैसी लोकप्रिय कल्याणकारी योजनाओं के जरिए वोटरों को दोबारा अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है। पिछले चुनावों में इस क्षेत्र ने भाजपा को बड़ी सफलता दिलाई थी।

2. औद्योगिक-कृषि स्विंग ज़ोन (दोनों चरण) मेदिनीपुर, हुगली, हावड़ा, बैरकपुर, घाटल और दुर्गापुर जैसे इलाके औद्योगिक और कृषि दोनों लिहाज से काफी अहम हैं। यहां बेरोजगारी, बंद होते कारखाने और किसानों के मुद्दे हार-जीत तय कर सकते हैं। 2021 में भी यहां कई सीटों पर जीत का अंतर बहुत कम था। टीएमसी लेबर यूनियनों और अपनी किसान योजनाओं के सहारे है, जबकि भाजपा बंद पड़ी फैक्ट्रियों और युवाओं की बेरोजगारी को लेकर मतदाताओं के गुस्से को भुनाने के प्रयास में है।

3. अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र: रणनीतिक मतदान (Strategic Voting) का असर मुर्शिदाबाद जैसे अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों के वोटर हमेशा चुनाव में अहम भूमिका निभाते हैं। अल्पसंख्यक मतदाता अक्सर ऐसा ‘रणनीतिक मतदान’ करते हैं जिससे भाजपा को जीत से रोका जा सके। पारंपरिक रूप से कांग्रेस और वामपंथ के गढ़ रहे इन क्षेत्रों में टीएमसी ने अल्पसंख्यक वोट बैंक को अपने पक्ष में कर बड़ी सफलता हासिल की है। भाजपा के लिए इन क्षेत्रों में सेंध लगाना एक बड़ी चुनौती है।

4. उत्तर बंगाल: भाजपा के किले की परीक्षा (पहला चरण) दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार जैसे जिले भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ माने जाते हैं। यहां गोरखालैंड, चाय बागान मजदूरों की मजदूरी और राजबंशी पहचान जैसे मुद्दे चुनावी बहस का मुख्य केंद्र हैं। टीएमसी क्षेत्रीय विकास बोर्ड और चाय बागान मजदूरों को जमीन का अधिकार देकर इस इलाके में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। भाजपा को अगर सत्ता में आना है, तो उसे यहां अपना पुराना शानदार प्रदर्शन दोहराना ही होगा।

(इसके अलावा, राज्य के शहरी इलाके और दक्षिण बंगाल टीएमसी के मुख्य गढ़ रहे हैं, जिन पर इस बार भी सबकी कड़ी नजर होगी।)

क्या होगा आगे? बंगाल चुनाव का पहला चरण भाजपा के मजबूत इलाकों में होना है, जबकि दूसरा चरण टीएमसी के प्रभाव वाले शहरी और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में होगा। टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) और भ्रष्टाचार के आरोपों से निपटना है। वहीं, भाजपा को नबन्ना (राज्य सचिवालय) तक पहुंचने के लिए औद्योगिक और टीएमसी के मजबूत इलाकों में बड़ा उलटफेर करना होगा।

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग ने सभी मतदान केंद्रों पर 100% वेबकास्टिंग और कड़ी सुरक्षा के निर्देश दिए हैं। देखना दिलचस्प होगा कि बंगाल की जनता इस बार किस पर अपना भरोसा जताती है।

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