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एफआईआर के बाद भी कुर्सी पर जमे अफसर, खुलेआम चल रहा भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार, जिला पंजीयन कार्यालय बना दलाली का अड्डा

एफआईआर के बाद भी कुर्सी पर जमे अफसर, खुलेआम चल रहा भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार, जिला पंजीयन कार्यालय बना दलाली का अड्डा

रिश्वत के दम पर धड़ल्ले से हो रहीं, अवैध रजिस्ट्रियां

गिर्राज रजक, ग्वालियर,

ग्वालियर का जिला पंजीयन कार्यालय इन दिनों भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और नियमविरुद्ध रजिस्ट्रियों का गढ़ बन चुका है। हैरानी की बात यह है कि जिन उपपंजीयकों के खिलाफ थानों में एफआईआर दर्ज हैं, लोकायुक्त और विभागीय जांचें चल रही हैं, वे आज भी कुर्सियों पर जमे हुए हैं और खुलेआम मोटा लेनदेन कर नियमों को ताक पर रखकर रजिस्ट्रियां संपादित कर रहे हैं।

सेवानिवृत्ति के बाद भी नहीं, निरस्त हुईं अवैध रजिस्ट्रियां

पहला मामला सेवानिवृत्त उपपंजीयक हरिओम शर्मा का है, जिनके द्वारा प्रतिबंधित जमीनों की चार रजिस्ट्रियां संपादित की गई थीं। मामला उजागर होने के बाद लोकायुक्त में एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि आज तक न तो इन रजिस्ट्रियों को निरस्त किया गया और न ही शून्य घोषित करने की कोई कार्यवाही प्रशासन या विभाग द्वारा की गई।

गरिमा रियल एस्टेट प्रकरण में बड़ा खेल

दूसरा गंभीर मामला उपपंजीयक के.एन. वर्मा से जुड़ा है। चिटफंड कंपनी गरिमा रियल एस्टेट की रजिस्ट्री मोटे लेनदेन के बाद संपादित की गई। मामला सामने आने पर तथ्यों को छुपाने का हवाला देकर कंपनी संचालक शिवराम कुशवाह के खिलाफ एफआईआर तो दर्ज कराई गई, लेकिन खुद की भूमिका पर पर्दा डालते हुए रजिस्ट्री निरस्त कराने की कोई पहल नहीं की गई।

इतना ही नहीं, डबरा की तीन रजिस्ट्रियों के मामले में के.एन. वर्मा के खिलाफ यूनिवर्सिटी थाने में तीन एफआईआर दर्ज होने के बावजूद वे आज भी उसी कुर्सी पर बैठकर खुलेआम अवैध रजिस्ट्रियां कर रहे हैं।

निलंबन के बाद भी बहाली, सवालों के घेरे में सिस्टम

उपपंजीयक मानवेंद्र भदौरिया द्वारा करोड़ों रुपये मूल्य की प्रतिबंधित जमीन की रजिस्ट्री संपादित किए जाने पर उन्हें निलंबित किया गया था, लेकिन कुछ ही समय में कथित मोटे लेनदेन के बाद उनकी बहाली कर दी गई। आज भी वे उसी कार्यालय में कार्यरत हैं, जबकि संबंधित रजिस्ट्रियों को आज तक शून्य या निरस्त नहीं किया गया।

शिकायत नहीं, तो जांच नहीं!

उपपंजीयक कपिल व्यास द्वारा भी एक चिटफंड कंपनी की करोड़ों की प्रतिबंधित संपत्ति की रजिस्ट्री संपादित किए जाने के आरोप हैं, लेकिन शिकायत के अभाव में न जांच हुई और न ही कोई कार्रवाई।

वसीयत के नाम पर खेल

सूत्रों की मानें तो उपपंजीयक अर्चना दिनकर द्वारा भी मोटी रकम लेकर वसीयत के आधार पर संदिग्ध रजिस्ट्री संपादित की गई है, जिसकी जांच अब तक ठंडे बस्ते में है।

प्रशासन और जांच एजेंसियां क्यों मौन?

स्थिति यह है कि ग्वालियर विकास प्राधिकरण की अनुबंधित जमीनें हों, प्रतिबंधित भूमि हो या अवैध कॉलोनियां—हर प्रकार की रजिस्ट्री यहां खुलेआम मोटा लेनदेन कर की जा रही है। बड़ा सवाल यह है कि प्रशासन, लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू आखिर मूकदर्शक क्यों बने हुए हैं?

ऊपर तक मिलीभगत के आरोप

सवाल यह भी उठता है कि क्या जिला पंजीयक और डीआईजी पंजीयन रावत भी इस भ्रष्टाचार के खेल में शामिल हैं? यदि नहीं, तो फिर इतने गंभीर मामलों में अब तक कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

अब देखना यह होगा कि इस गंभीर और व्यापक भ्रष्टाचार के खुलासे के बाद शासन-प्रशासन कोई ठोस कार्रवाई करता है या फिर जिला पंजीयन कार्यालय यूं ही भ्रष्टाचार का अड्डा बना रहेगा।

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